जानिए ग्लूकोमा के बारे में, कितनी खतरनाक है ये बीमारी और क्या हैं बचाव के तरीके

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ग्लूकोमा आंखों में होने वाली गंभीर बीमारी है। इसे काला मोतियाबिंद भी कहा जाता है। www.myupchar.com से जुड़े एम्स के डॉ. अजय मोहन के अनुसार, ‘हमारी आंखों में ऑप्टिक नर्व होती है जो किसी भी वस्तु का चित्र बनाकर दिमाग तक पहुंचाती है। ग्लूकोमा के कारण इस ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है और मरीज की आंखों की रोशनी चली जाती है। यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन बूढ़े लोगों में ज्यादा पाई जाती है।’ भारत में 40 से ज्यादा उम्र के करीब 1 करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण अधिकांश लोग आंखों की रोशनी खो बैठते हैं।

बिना लक्षण के हमला करती है ग्लूकोमा
ग्लूकोमा बीमारी बिना लक्षण के हमला करती है। यानी जब तक इसका असर सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इससे भी खतरनाक बात यह है कि ग्लूकोमा के कारण खोई रोशनी फिर नहीं लौटाई जा सकती है। इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि समय-समय पर आंखों की जांच करवाते रहना चाहिए। आंखों पर पड़ने वाले दबाव के आधार पर ग्लूकोमा की बीमारी का पता लगाया जाता है।

ये लक्षण नजर आएं तो तत्काल जांच करवाएं
आंखों या सिर में तेज दर्द
बिना कारण के आंखें लाल होना
अचानक धुंधला दिखाई देना या रोशनी कमजोर होना
जी मिचलाना या उल्टी होना

किन लोगों को ग्लूकोमा का खतरा ज्यादा
उम्रदराज लोग
ब्लड शुगर या हाइपोथायरायडिज्म के मरीज
आंख में चोट लगना या इससे जुड़ी कोई दूसरी समस्या होना
आंखों से लगातार पानी आना
हाई ब्लड प्रेशर के मरीज

ग्लूकोमा से बचाव का तरीका
डॉ. अजय मोहन के अनुसार, ‘नियमित रूप से जांच करवाना ही ग्लूकोमा से बचाव का तरीका है। सही समय पर इलाज मिले तो इसके कारण होने वाली बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है। 40 साल से कम उम्र वाले साल में दो बार जांच करवाएं। इससे ज्यादा उम्र वालों को साल में तीन बार जांच करवानी चाहिए।’ इसके अलावा आंखों से जुड़ी एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है। आंखों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखें। आंखों में चोट लगने से ट्रॉमेटिक ग्लूकोमा या सेकेंडरी ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है।

www.myupchar.com से जुड़े एम्स के डॉ. आयुष पांडे बताते हैं कि ग्लूकोमा के इलाज के अन्य तरीके या दवाएं असर न दिखाए तो सर्जरी की नौबत आ जाती है। बीमारी की गंभीरता देखते हुए डॉक्टर सर्जरी का फैसला लेते हैं। हालांकि, सर्जरी के बाद भी मोतियाबिंद का खतरा बना रहता है।

ग्लूकोमा से बचने के लिए कॉफी का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है। जो लोग बहुत अधिक धूम्रपान करते हैं, उनमें ग्लूकोमा का खतरा ज्यादा रहता है। इसके अलावा जो लोग फूंक मारकर कोई यंत्र बजाते हैं, उनमें इंट्रा-ओक्युलर दबाव के कारण ग्लूकोमा का जोखिम अधिक रहता है। अधिक वजन या मोटापा भी इस बीमारी का कारण बनता है। स्लीप एपनिया सिन्ड्रॉम भी ग्लूकोमा से जुड़ा है। यानी जिन लोगों को नींद के दौरान सांस लेने में समस्या आती है, वे सावधान रहें। ग्लूकोमा रोगियों को पानी या अन्य तरल पदार्थों के अधिक सेवन से बचना चाहिए।

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स्वास्थ्य आलेख www.myUpchar.com द्वारा लिखे गए हैं

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